26th October 2020

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इरफ़ान खान को श्रद्धान्जलि

अलविदा इरफ़ान, हम आपके कर्ज़दार रहेंगे ! वरिष्ठ पत्रकार उपेन्द्र चौधरी की कलम से श्रद्धान्जलि।

1988 में आयी सलाम बॉम्बे के बाद 1990 में एक डॉक्टर की मौत। तपन सिन्हा की इस फ़िल्म ने भारतीय लोकतंत्र की अव्यवस्था और बदइंतज़ामी के साथ-साथ कई उलझे और समझ में नहीं आने वाले सवालों की पोल खोलकर रख दी थी। फ़िल्म में बताया गया था कि खोज और आविष्कार तक को राजनीति नहीं बख़्शती। किसी संत और फ़कीर की तरह दिन रात काम करने वाले और अपनी निजी ज़िंदगी को सार्वजनिक हित के लिए कुर्बान कर देने वाला डॉक्टर किस तरह सियासत का शिकार होता है और किसी की खोज और आविष्कार का श्रेय किस तरह कोई और हड़प लेता है। फ़िल्म में डॉक्टर दीपांकर रॉय के किरदार को जितना पंकज कपूर ने जिया था,उसी जीने के क़रीब की दमदार भूमिका शबाना आज़मी ने भी निभायी थी। मगर इस फ़िल्म में हमेशा मुस्कुराता और छरहरे बदन का लड़का से दिखने वाले इरफ़ान ने अपनी एक्टिंग की असरदार मौजूदगी दर्ज की थी।

इरफ़ान की थोड़ी कम असर छोड़ती आवाज़ में उनकी बोलती आंखों की आवाज़ उनकी एक्टिंग को उस धरातल पर ले जाती थी, जहां फ़िल्मी पर्दे हक़ीक़त की दुनिया बन जाते थे। इस सिलसिले में उनकी तमाम फ़िल्में गिनायी जा सकती हैं।फ़िल्मों में उनका किरदार कितना अहम या कितने लम्बे समय तक पर्दे पर रहता है,इरफ़ान के लिए यह मायने नहीं रखता था।इरफ़ान के लिए छोटे-से-छोटे किरदार को असरदार बनाकर लम्बे समय तक दर्शकों के दिल-ओ-दिमाग़ में जज़्ब कर देना ही मायने रखता था।

मगर, इरफ़ान का परिचय सिर्फ़ इतना ही नहीं,इससे कहीं ज़्यादा है।हालांकि उसकी चर्चा शायद बहुत कम हुई है। उन्हें सिर्फ़ इसलिए याद नहीं किया जायेगा कि उन्होंने अपनी एक्टिंग को अपने निभाये गये किरदार के बेहद नज़दीक ले आते थे,बल्कि इसलिए भी कि जिन सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से उनके किरदार बनते-संवरते थे या बावस्ता थे,उन्हें भी वो पोर-पोर में जानते-समझते थे। चंद साल पहले उन्होंने अपने इंटरव्यू में कहा था कि लोग उनके नाम के आगे ‘ख़ान’ नहीं लगायें,तो उन्हें अच्छा लगेगा।जिस समाज में ख़ान-पठान जैसा टाइटिल सामाजिक हैसियत रखती हो,उससे जुड़ाव इरफ़ान को नागवार था। वह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि उनकी पहचान किसी समुदाय विशेष या क्षेत्र विशेष से की जाय। वह इस बात के हमेशा हामी रहे कि किसी की भी पर्सनैलिटी उसके काम और उनकी सोच से बनती है। वह अंधविश्वासों और धर्म-संस्कृतियों की कमियों पर खुलकर बोलते थे।

इरफ़ान आम मर्दों वाली दुनिया के अलग मर्द थे। इरफ़ान मर्दों के उस अत्यल्पसंख्यक से तबके से आते थे,जिसके बीच औरतों की पहचान गुम नहीं होती है,बल्कि उनकी दुनिया की औरतें परिवार-समाज और अपने काम के इलाक़े में अपनी एक स्वतंत्र पहचान रखती है।यही वजह है कि उनकी पत्नी,अपनी मुकम्मल पहचान के साथ सुतापा सिकदर ही बनी रही,इरफ़ान ने सुतापा को ख़ान बनाने की कोशिश नहीं की,जैसा कि हमारी आपकी दुनिया में ऐसा अक्सर ही ऐसे हो जाया करता है,जैसे कि मर्दों के नाम ही नहीं,उसके व्यक्तिगत और पारिवारिक-सामाजिक-धार्मिक संस्कार में जज़्ब हो जाना औरतों का असली और स्वाभाविक चरित्र हो ! ये सच नहीं है,इरफ़ान ऐसा ही मानते थे। अभिनय के जादूगर और मायने बख़्शती ज़िंदगी के पैरोकार बेहतरीन इंसान इरफ़ान को श्रद्धांजलि !!!

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